लाशों से शर्मिंदा हूँ ॥

मुर्दों सा जो ज़िंदा हूँ ॥

पर औ’ पाँव कटे तो क्या ,

ज़ात का एक परिंदा हूँ ॥

बेघर हूँ तो क्या उनके ,

दिल का तो बाशिंदा हूँ ॥

अँधियारा भागे मुझसे ,

ऐसा मैं ताबिंदा हूँ ॥

लगता हूँ साहब जैसा ,

वैसे मैं कारिंदा हूँ ॥

कल मैं उनका माज़ी था ,

औ’ कल का आइंदा हूँ ॥

तारीफ़ें सब पीठों पर ,

मुँह पे करता निंदा हूँ ॥

वैसे हूँ जाँबख़्श मगर ,

गाह ब गाह दरिंदा हूँ ॥

( ताबिंदा =चमकने वाला ,कारिंदा = कर्मचारी ,माज़ी = भूतकाल ,आइंदा = भविष्य ,जाँबख़्श = मरने से बचाने वाला ,गाह ब गाह = कभी कभी )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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