ग़ज़ल : 211 : बेवफ़ा कलमुँहा ,मुँहजला इश्क़ है ॥

बेवफ़ा कलमुँहा , मुँहजला इश्क़ है ॥ किसने तुझसे कहा इक बला इश्क़ है ?1॥ हैं अगर कोई तो ; वो हैं आशिक़ बुरे , इश्क़ को मत बुरा कह ; भला इश्क़ है ॥2॥ है सुपाड़ी के जैसा कभी...Read more

ग़ज़ल : 210 – सवाल इक पूछना है

सफ़र कर आ रहे हैं जो समंदर का महीनों से ; किनारे आ के भी उतरें न अब क्यों वो सफ़ीनों से ॥ यक़ायक़ क्या हुआ जिनके लगे रहते थे पीछे ही ; छुड़ाते दिख रहे पीछा वही अब उन...Read more

ग़ज़ल : 209 – तूने जिसे कहा था

तूने जिसे कहा था आब ; आब ही सुना ॥ मैंने न उसको जह्र या शराब ही सुना ॥ तूने जिसे कहा था सच नहीं है ये , कभी मैंने भी उसको दिन का एक ख़्वाब ही सुना ॥ तूने...Read more

*मुक्त-मुक्तक : 856 – माथे धर वंदन होता ॥

प्रातः के पश्चात सांध्य भी माथे धर वंदन होता ॥ तुलसी की मानस का घर-घर में सस्वर वाचन होता ॥ पढ़कर मनोरंजन ना कर यदि हृदयंगम सब करते तो , मर्यादाओं का जग में सच क्योंकर उल्लंघन होता ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

ग़ज़ल : 208 : दिल चुरा के फ़रार होते हैं ॥

खूबसूरत जो यार होते हैं ; दिल चुरा के फ़रार होते हैं ॥1॥ तीर चल जाएँ फिर कहाँ रुकते , आर होते या पार होते हैं ॥2॥ हमपे होते नहीं जो क़ुर्बां हम , उनपे अक्सर निसार होते हैं ॥3॥...Read more

मुक्तक : 855 – मीठी झील तक गए ॥

कब अपने शहर की ही मीठी झील तक गए ॥ दो – चार – छः नहीं हजारों मील तक गए ॥ प्यासे थे इस क़दर कि सब कुएँ , तलाव पी ; गंगो–जमन , चनाब , मिश्र – नील तक गए ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more