बाहर से कोई ढूँढे भी काफ़िर नहीं मिला ॥

अंदर किसी के एक भी मंदिर नहीं मिला ॥

पर्वत सा मत हिलो जो मुझे कह रहा था कल ,

आँधी में वो भी झण्डे सा पल थिर नहीं मिला ॥

हों हाथ , पैर , सीना औ’ गर्दन सुराही सी ,

किस काम की वो देह जिसे सिर नहीं मिला ?

आग़ाज़ हस्बे मर्ज़ी न पाया ये ख़ैर थी ,

अफ़्सोस क्यों पसंद का आख़िर नहीं मिला ?

इंसानियत से था वो लबालब ख़ुदा क़सम ,

शैतान उसके जैसा कहीं फिर मिला नहीं ॥

( काफ़िर = किसी को न मानने वाला । आग़ाज़ = प्रारम्भ, जन्म । हस्बे मर्ज़ी = मनोवांछित । आख़िर = अंत , मृत्यु )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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