ज़िंदगी इतनी जल रही होगी ॥

मौत सिल सी भी गल रही होगी ॥

वो उसे दे रहा दग़ा होगा ,

वो उसे कसके छल रही होगी ॥

रेंग अब भी वो चुप रहा होगा ,

चीख़-चिल्ला वो चल रही होगी ॥

बढ़ रहा होगा कोई महलों में ,

कोई कुटिया में पल रही होगी ॥

अपने साँचे में मुझको गढ़ फिर वो ,

मेरे साँचे में ढल रही होगी ॥

उसको तक-तक बहुत जो शर्मायी ,

उसकी महबूबा कल रही होगी ॥

जिसको वह गीत जैसा गाता था ,

वह ज़रूर इक ग़ज़ल रही होगी ॥

रेगमालों पे दौड़ने वाली ,

काई पे चल फिसल रही होगी ॥

भर बुढ़ापे में उसकी छाती पर ,

ज़िंदगी मूँग दल रही होगी ॥

मारके मुझको देखना जाकर ,

हाथ अपने वो मल रही होगी ॥

अपने बच्चों को ख़ुद उबलती माँ ,

पंखा गर्मी में झल रही होगी ॥

पूछता था वो क्यों सवाल उससे ,

उसका शायद वो हल रही होगी ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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