हैं अभी दीपक ; कभी तो आफ़्ताब होंगे ॥

गर नहीं हम आज तो कल कामयाब होंगे ॥

दुरदुराओ मत हमें काग़ज़ के फूलों सा ;

देखना इक दिन हमीं अर्क़े गुलाब होंगे ॥

आज तक तो आबे ज़मज़म हैं मगर शायद ;

आपकी सुह्बत में हम कल तक शराब होंगे ॥

आज हम फाँकें चने तो तश्तरी में कल ;

क्या ज़रूरी है नहीं शामी कबाब होंगे ?

भेड़िये जो खोल में रहते हैं गायों के ;

इक न इक दिन देखना ख़ुद बेनक़ाब होंगे ॥

आज कोई भी नहीं फ़न का हमारे पर ;

एक दिन मद्दाह सब आली जनाब होंगे ॥

( आफ़्ताब=सूर्य / दुरदुराना=उपेक्षा करना / आबे ज़मज़म=पवित्र जल / सुह्बत=संगति / मद्दाह=प्रशंसक )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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