दे सका ना खिलौने रे बच्चों को मैं ॥

अपने नन्हें खिलौनों से बच्चों को मैं ॥

चाहता था कि दूँ चाँद-तारे उन्हें ,

हाय ! बस दे सका ढेले बच्चों को मैं ॥

माँगते थे वो रोटी तो देता रहा ,

मन के लड्डू सदा भूखे बच्चों को मैं ॥

पीटता था बुरों को कोई ग़म नहीं ,

डाँटता क्यों रहा अच्छे बच्चों को मैं ?

सोचता था कि बच्चे हरिश्चन्द्र हों ,

मानता सच रहा झूठे बच्चों को मैं ॥

इक पिता था समझता रहा फूल ही ,

धुर नुकीले , कड़े , पैने बच्चों को मैं ॥

रो दिया देखकर पेट को पालने ,

ईंट-गारे को सर ढोते बच्चों को मैं ॥

घर चलाते हैं बचपन से ही बन बड़े ,

बाप बोला करूँ ऐसे बच्चों को मैं ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *