मेरी हर तक्लीफ़ हर मुश्किल का यारों यक-ब-यक ,

उसने मेरे सामने हल चुटकियों में धर दिया ।।

आज उस दुश्मन की है तारीफ़ का मंशा बहुत ,

काम जिसने आज जानी दोस्त वाला कर दिया ।।

थी बहुत जिददो जहद थी कशमकश मैं क्या करूँ ?

सोचता रहता था बस ; फाँसी चढ़ूँ या कट मरूँ ?

जानता था ख़ुदकुशी करना है मुझको इसलिए ;

उसने आकर मेरे मुँह में जह्र लाकर भर दिया ।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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