नहीं ख़स्ता कचौड़ी के , नहीं तीखे समोसे के ॥

नहीं तालिब हैं हम इमली न ख़्वाहिशमंद डोसे के ॥

न लड्डू , पेड़ा , रसगुल्ला ; न रबड़ी के तमन्नाई ;

हैं भूखे हम बहुत लेकिन तुम्हारे एक बोसे के ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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