ग़ज़ल : 218 – जंगलों की आग बन जा

उनके दिल में कर न तू बसने की तैयारी ।। उनकी नज़रों में कोई पहले ही है तारी ।।1।। जंगलों की आग बन जा या तू बड़वानल , वो तुझे समझेंगे फिर भी सिर्फ़ चिंगारी ।।2।। इससे बचके रहना ही...Read more

*मुक्त-मुक्तक : 865 – उन आँखों पे पड़ी नक़ाबें हैं ॥

पढ़ो तो फ़लसफे की दो अहम किताबें हैं ॥ जो पी सको तो ये न आब ; ये शराबें हैं ॥ मगर क़िले के बंद सद्र दर सी पलकों की ; अभी बड़ी उन आँखों पे पड़ी नक़ाबें हैं ॥ ( फ़लसफ़ा =...Read more

*मुक्त-मुक्तक : 864 – मैं तेरी राह तके बैठा हूँ ॥

रात–दिन इस ही जगह पर न थके बैठा हूँ ॥ कब से अपलक मैं तेरी राह तके बैठा हूँ ॥ चलके मत आ कि बस उड़के ही चला आ आगे , तेरे दीदार का प्यासा न छके बैठा हूँ ॥ (...Read more

*मुक्त-मुक्तक : 863 – दिल की बात ?

दो-चार-दस न बीस साल बल्कि ताहयात ॥ करवट बदल-बदल के,जाग-जाग सारी रात ॥ समझोगे कैसे तुम दिमाग़दारों ख़ब्त में ; मैंने तो की है शायरी में सिर्फ़ दिल की बात ? ( ताहयात = सारा जीवन , ख़ब्त = पागलपन ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति Read more

*मुक्त-मुक्तक : 862 – बाग़ ही बाग़ हैं

रेगज़ारों में भी बरसात की फुहारें हैं ॥ बाग़ ही बाग़ हैं फूलों की रहगुज़ारें हैं ॥ जब थीं आँखें थे सुलगते हुए सभी मंज़र , जब से अंधे हैं हुए हर तरफ़ बहारें हैं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

ग़ज़ल : 217 – नहीं कोई हाथों में रखता है ‘ हीरा ‘

कि सिर फोड़कर या कि पैरों में पड़कर ।। मुक़द्दर से जीता यहाँ कौन लड़कर ?1।। जिन्हें मिलना है वो भी मिलकर रहेंगे , बिछड़ना है जिनको रहेंगे बिछड़कर ।।2।। हमेशा नहीं रहते क़ाबिज़ वहाँ पर , गिरें शाख़ से...Read more