रेगज़ारों में भी बरसात की फुहारें हैं ॥

बाग़ ही बाग़ हैं फूलों की रहगुज़ारें हैं ॥

जब थीं आँखें थे सुलगते हुए सभी मंज़र ,

जब से अंधे हैं हुए हर तरफ़ बहारें हैं ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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