दो-चार-दस न बीस साल बल्कि ताहयात ॥

करवट बदल-बदल के,जाग-जाग सारी रात ॥

समझोगे कैसे तुम दिमाग़दारों ख़ब्त में ;

मैंने तो की है शायरी में सिर्फ़ दिल की बात ?

( ताहयात = सारा जीवन , ख़ब्त = पागलपन )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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