रात–दिन इस ही जगह पर न थके बैठा हूँ ॥

कब से अपलक मैं तेरी राह तके बैठा हूँ ॥

चलके मत आ कि बस उड़के ही चला आ आगे ,

तेरे दीदार का प्यासा न छके बैठा हूँ ॥

( तके = देखते हुए , दीदार का = दर्शन का , छके = तृप्त )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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