ग़ज़ल : 219 – खा-खा कर ॥

अपनों से बैठे खफ़ा हैं खार खा-खा कर ।। घूँट पीते ख़ून का खूंख़्वार खा-खा कर ।।1।। बेबसी में जो न खाना था वही जाँ को ; हम बचाते पड़ गए बीमार खा-खा कर ।।2।। इस क़दर मज़्बूर हैं हम...Read more

*मुक्त-मुक्तक : 866 – ये तेरा जिस्म

तू सिर से पाँव तक बेशक निहायत खूबसूरत है ॥ ये तेरा जिस्म संगेमरमरी कुदरत की मूरत है ॥  नहीं बस नौजवानों की , जईफ़ों की भी अनगिनती ; तू सचमुच मलिका-ए-दिल है , मोहब्बत है , ज़रूरत है ॥ (  जईफ़ों = वृद्धों ) –डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more