ग़ज़ल : 221 – तुझमें ज़िद आर्ज़ू की

उम्र ढलती है मेरी तो ढलती रहे ।। हाँ जवानी तुम्हारी सँभलती रहे ।।1।। अपनी सब हसरतें मैं मनालूँ अगर , तुझमें ज़िद आर्ज़ू की मचलती रहे ।।2।। मौत जब तक न आए फ़क़त ज़िंदगी , पाँव बिन भी ग़ज़ब...Read more

ग़ज़ल : 220 – शर्म बैठी है पर्दों में

जैसे ख़ुशबू गुलाबों में भी ना दिखे ।। उनको नश्शा शराबों में भी ना दिखे ।।1।। उस हसीं चश्म को भी मैं अंधा कहूँ , हुस्न जिसको गुलाबों में भी ना दिखे ।।2।। बदनसीब इस क़दर कौन होगा भला ,...Read more