जैसे ख़ुशबू गुलाबों में भी ना दिखे ।।

उनको नश्शा शराबों में भी ना दिखे ।।1।।

उस हसीं चश्म को भी मैं अंधा कहूँ ,

हुस्न जिसको गुलाबों में भी ना दिखे ।।2।।

बदनसीब इस क़दर कौन होगा भला ,

दिलरुबा जिसको ख़्वाबों में भी ना दिखे ?3।।

शर्म बैठी है पर्दों में छिपके कहीं ,

बेहयाई नकाबों में भी ना दिखे ।।4।।

ढूँढो सहराइयों में न तहज़ीब तुम ,

अब सलीका जनाबों में भी ना दिखे ।।5।।

अक़्ल उनको कहीं से भी मिलती नहीं ,

इल्म उनको किताबों में भी ना दिखे ।।6।।

( हसीं चश्म = सुनयन , सहराइयों = असभ्य )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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