ग़ज़ल : 247 – परदेस में

देस से परदेस में आकर हुआ मैं ।। सेर भर से एक तोला भर हुआ मैं ।।1।। रेलगाड़ी जब से पाँवों से है गुज़री , सच में उस दिन से ही यायावर हुआ मैं ।।2।। कब रहा काँटा मैं ग़ुस्से...Read more

ग़ज़ल : 246 – क़ब्र खोदने को ……

हैराँ हूँ ; लँगड़े , चीतों सी तेज़ चाल लेकर ।। चलते हैं रोशनी में अंधे मशाल लेकर ।।1।। हुशयारों से न जाने करते हैं कैसे अहमक़ , आज़ादियों के चर्चे हाथों में जाल लेकर ।।2।। चलते नहीं उधर से...Read more

ग़ज़ल : 245 – धूप क्या होती है

एक पतला जानकर पापड़ तला वो ।। बिन हथौड़ा तोड़ने मुझको चला वो ।।1।। धूप क्या होती है दुख की , क्यों वो जाने ? सुख के साये में हमेशा ही पला वो ।।2।। फूँककर पीता है गर जो छाछ...Read more

ग़ज़ल : 244 – मामूली मकान

कल वो दिखती थी तुलसी आज पान लगती है ।। सच में गीता तो वो कभी क़ुरान लगती है ।।1।। उसकी आवाज़ की न पूछ क्या है लज़्ज़त सच , उसके मुँह से तो गाली भी अजान लगती है ।।2।।...Read more

ग़ज़ल : 243 – राख़ हो जाता है सब कुछ

नज़र से गिरके उठने का किसी का वाक़िआ बतला ।। गड़े मुर्दे के चलने का किसी का वाक़िआ बतला ।।1।। ज़ुबाँ रखकर भी चुप रहते हैं कितने ही ज़माने में , मुझे गूँगे के कहने का किसी का वाक़िआ बतला...Read more

ग़ज़ल : 242 – महुए की कच्ची सुरा हूँ ॥

गड़ता कम भुँकता बुरा हूँ ।। पिन नहीं पैना छुरा हूँ ।।1।। एक सिर से पाँव दो तक , कोयले ही से पुरा हूँ ।।2।। हड्डियों सा हूँ कभी , मैं बिस्कुटों सा कुरकुरा हूँ ।।3।। काठ का पहिया हो...Read more