जितना आँखों से उसको हटाता गया ।।

उतना दिल में वो मेरे समाता गया ।।1।।

यों वो आया था देने तसल्ली मगर ,

जाते – जाते मुझे फिर रुलाता गया ।।2।।

क्या कहूँ रहनुमा ही मेरी राह में ,

जाल बुन-बुन के गिन-गिन बिछाता गया ।।3।।

वो परिंदे जो मुश्किल से फाँसे गए ,

सारे सय्यादों के वो छुड़ाता गया ।।4।।

एक ही आग के दो असर देखिए ,

मैं बुझाता रहा ; वो जलाता गया ।।5।।

कैसे रहता सलामत मेरे पास कुछ ,

मैं बनाता रहा वो मिटाता गया ।।6।।

इस क़दर मैंने ग़ुस्सा दिलाया उसे ,

गालियाँ ; गाने वाला सुनाता गया ।।7।।

रौ में इक दिन नशे की वो बहकर मुझे ,

हर दबा राज़ दिल का बताता गया ।।8।।

पेट भरने की ख़ातिर वो मुफ़्लिस चने ,

रोज़ लोहे के चुन – चुन चबाता गया ।।9।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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