या मेले में सँग मेरे कल्लोलो तो ।।

या एकांत में कांधे सर धर रो लो तो ।।1।।

सुनकर तुमको बहरापन मेरा जाता ,

क्यों चुप हो ? संकेतों से ही बोलो तो ।।2।।

क्यों रहते हो कुछ दिन से गुमसुम-गुमसुम ?

भेद है जो अपने मन में सब खोलो तो ।।3।।

तुम चट्टान हो तो मैं भी इक पर्वत हूँ ,

मैं भी डिग जाऊँगा यदि तुम डोलो तो ।।4।।

मुझको मिल जाएगा स्वर्ग धरा पर ही ,

तुम मेरी बाँहों में कुछ पल सो लो तो ।।5।।

मैं सम्पूर्ण तुम्हारा हो जाऊँगा सच ,

तुम थोड़े बस थोड़े मेरे हो लो तो ।।6।।

मुझ पर मैल लगा है कोई दाग़ नहीं ,

निष्कालिख हो जाऊँगा यदि धो लो तो ।।7।।

सप्त रँगों से क्या तुम से तो मैं हँस-हँस ,

रँगवा लूँ ख़ुद को कालिख भी घोलो तो ।।8।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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