देस से परदेस में आकर हुआ मैं ।।

सेर भर से एक तोला भर हुआ मैं ।।1।।

रेलगाड़ी जब से पाँवों से है गुज़री ,

सच में उस दिन से ही यायावर हुआ मैं ।।2।।

कब रहा काँटा मैं ग़ुस्से में भी कल तक ,

प्यार में भी आजकल ख़ंजर हुआ मैं ।।3।।

हो गया था आदमी जानूँ न कैसे ,

फिर वही पहले सा इक बंदर हुआ मैं ।।4।।

एक वो रहने लगे क्या दिल में मेरे ,

कमरे से होटल के यारों घर हुआ मैं ।।5।।

देखकर बर्ताव दुनिया का गुलों सँग ,

मोम से इक सख़्ततर पत्थर हुआ मैं ।।6।।

( यायावर = घुमक्कड़ , nomad )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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