न जाने वो क्या किस सबब कर रहा है ?

मगर इतना तै है गज़ब कर रहा है ॥

वही जाने क्या उसका मक़्सद है लेकिन ,

लगे है कि वो कुछ अजब कर रहा है ॥

वो ख़ुद अपने मुंसिफ़ से अपने गुनह की ,

सज़ा आगे बढ़-बढ़ तलब कर रहा है ॥

करे जितनी सूरज की इज्ज़त वो उतना ,

चिराग़ों का भी बढ़ अदब कर रहा है ॥

वो अपने नहीं ग़ैर के ख़्वाब को सच ,

बनाने का हर एक ढब कर रहा है ॥

बहुत धीरे-धीरे मगर जाने जाँ को ,

वो अपनी ही अब अपना रब कर रहा है ॥

फ़क़त रूह का मेरी तालिब वो बंदा ,

मेरा जिस्म भी अब तलब कर रहा है ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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