*मुक्त-मुक्तक : 870 – दाँतों को पीस

दाँतों को पीस , मुट्ठियों को कस ख़ुदा क़सम ॥ खा-खा के एक दो न बल्कि दस ख़ुदा क़सम ॥ इक दौर था पसीना मेरा ग़ुस्से में भी तुम , इत्रे गुलाब बोलते थे बस ख़ुदा क़सम ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

*मुक्त-मुक्तक : 869 – लो सप्त रंग

लो सप्त रंग घोल-घोल साथ ले जाओ ॥ कलंकहीनों संग होली खेलकर आओ ॥ रँगे सियार रँगने में न रंग ख़र्च करो , न रँग बदलते हुए गिरगिटों से रँगवाओ ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

*मुक्त-मुक्तक : 868 – किसी का मौन

किसी की चीख़ और ना फिर किसी का मौन रोकेगा ॥ न हिन्दू सिक्ख ईसाई न जैन औ’ जौन रोकेगा ॥ जब ऊग आएँगे मेरी पीठ पर दो पंख उड़ने को , मुझे छूने से फिर आकाश बोलो कौन रोकेगा ॥ (...Read more

*मुक्त-मुक्तक : 867 – दर खुला पिंजरे का रख

मुझसे बंदर को कहे कूदूँ न मैं , उछलूँ न मैं ! दर खुला पिंजरे का रख बोले कभी निकलूँ न मैं ! बर्फ़ हूँ यह जानकर दुश्मन मेरा मुझको पकड़ , धूप में रखकर ये कहता है मुझे पिघलूँ न...Read more

होली मुक्तक : मुझे चुमकार होली में ॥

रहूँगा मैं नहीं तैयार खाने मार होली में ॥ लगा फटकार निसदिन पर मुझे चुमकार होली में ॥ तू मुझसे दूर रहले साल भर भी मत मुझे तक तू , लगा कस – कस गले मुझको मगर हर बार होली में...Read more

ग़ज़ल : 230 – पूछना तुम तीन होली में ॥

उसका मन इस बार हम बन दीन होली में ॥ दान ले लेंगे या लेंगे छीन होली में ॥ श्वेत हों या श्याम हों ; कितने भी हों बेरंग , करके रख देंगे उन्हे रंगीन होली में ॥ जिनको गुब्बारा...Read more