कोई कछुआ तो कोई सिंह समान चलता है ॥

कोई शीशे सा कोई बर्फ़ सा पिघलता है ॥

हस्ति के आगे क्या पिपीलिका है पर सोचो ,

सूर्य है सूर्य वैसे दीप भी तो जलता है ॥

कोई पाहन हथौड़ी , छैनी से बने मानव ,

कोई साँचों में गल के देवता में ढलता है ॥

है सुनिश्चित जब अंत तो महान मृत्युंजय –

जाप कितने भी तुम करालो ये न टलता है ॥

कोई खाए सँभल-सँभल के चल के भी ठोकर ,

और खा-खा के कोई ठोकरें सँभलता है ॥

जग हुआ उलटा शेर अब पका रहे सब्ज़ी ,

बैल खाने को माँस भूनता है तलता है ॥

सत्य रहता सड़क पे ज्यों अवैध संतति हो ,

और युवराज सा महल में झूठ पलता है ॥

एक फिरता है नंगा कड़कड़ाती सर्दी में ,

दूजा मौसम में लू के कंबल ओढ़ चलता है ॥

( हस्ति = हाथी , पिपीलिका = चींटी )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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