तुम सा न कोई बाग़ में है दूसरा गुलाब सच ॥

तुम दिन का आफ़्ताब रात का हो माहताब सच ॥

मैं जब नशे में इश्क़ के हूँ चूर-चूर तो भला ,

फिर कैसे ले लूँ हाथ में मैं जाम-ए-शराब सच ?

पढ़ने समझने से ही इल्म हो हमें मगर ग़ज़ब ,

उनको हो रखने भर से हाथ में ज़रा किताब सच ॥

वैसे तो चाहता हूँ उनको मैं फ़क़त करूँ मना ,

मज़्बूरियाँ हैं उनको बोलने की ‘ जी जनाब ‘ सच ॥

दिखने के रेगज़ारे थार ओ सहारा वो दरअस्ल ,

झेलम औ’ व्यास , रावी औ’ सतलज औ’ हैं चनाब सच ॥

क्या ओढ़नी मैं सर की तेरे क्या दुपट्टा सीने का ,

तैयार हूँ मैं बनने तेरे पाँव की जुराब सच ॥

करता हूँ तुझसे पूछ मत मैं ठीक-ठीक कितना प्यार ?

झूठा लगेगा तुझको जो भी दूँगा मैं हिसाब सच ॥

( आफ़्ताब =सूर्य , माहताब =चंद्रमा , इल्म =ज्ञान , फ़क़त =केवल , रेगज़ारे थार ओ सहारा =थार और सहारा मरुस्थल , जुराब =जुर्राब ,मोजा )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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