कब तक कि तेरी याद में आँखों को नम रखूँ ?

तू खुश है मुझ से दूर तो क्यों मैं भी ग़म रखूँ ?

मेरे सिवा भी तेरे हैं दो एक और अगर ,

फिर क्या बुरा जो मैं भी दो अपने सनम रखूँ ?

कोई भी दर हो जिससे उठा दे कोई मुझे ,

कटवा दूँ पैर पर न वहाँ फिर क़दम रखूँ ॥

चाहे जरूरतों से ज़ियादा न हो मगर ,

सामाँ ज़रूर एक भी उससे न कम रखूँ ॥

मज़्बूरियाँ कुछ ऐसींं कि अब एक हाथ में ,

बंदूक , दूसरे में चमकती क़लम रखूँ ॥

हालात ने ही मोम को लोहा बना दिया ,

हूँ काँच फिर भी हीरा कतरने का दम रखूँ ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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