उसका मन इस बार हम बन दीन होली में ॥

दान ले लेंगे या लेंगे छीन होली में ॥

श्वेत हों या श्याम हों ; कितने भी हों बेरंग ,

करके रख देंगे उन्हे रंगीन होली में ॥

जिनको गुब्बारा फुलाने में भी हो पीड़ा ,

उनसे बजवाएँँगे नचने बीन होली में ॥

उस हृदय की पीठिका में है शपथ हमको ,

होके दिखलाएँँगे कल आसीन होली में ॥

हारते आए जो कल तक देखना तुम कल ,

जीत का फहराएँगे हम चीन होली में ॥

कब किसी रंगोत्सव में हम तनिक रत हों ,

पर रहें सच सर्वथा लवलीन होली में ॥

हम उन्हे रँगकर रहेंगे चाहे वो आएँ ,

सूट पहने या कि बस कोपीन होली में ॥

कोई प्रश्न हमसे करे चिढ़ जाते हैं हम पर ,

एक दो क्या पूछना तुम तीन होली में ॥

( चीन = झण्डा , कोपीन = लँगोट )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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