दाँतों को पीस , मुट्ठियों को कस ख़ुदा क़सम ॥

खा-खा के एक दो न बल्कि दस ख़ुदा क़सम ॥

इक दौर था पसीना मेरा ग़ुस्से में भी तुम ,

इत्रे गुलाब बोलते थे बस ख़ुदा क़सम ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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