ग़ज़ल : 232 – मीर के दीवान बिकते हैं ?

कहीं पर रात में आधी ; सजे अरमान बिकते हैं ॥ कहीं पर दिन दहाड़े मौत के सामान बिकते हैं ॥ ख़रीदें ज्यों लतीफ़ों की किताबें लोग हाथों हाथ , नहीं क्यों दाग़ , ग़ालिब , मीर के दीवान बिकते...Read more

ग़ज़ल : 231 – ख़ुश बहुत ख़ुश आए दिन

ख़ुश वो मुझको यों हमेशा ही रुला के होते हैं ॥ राधिका को कृष्ण ज्यों झूला झुला के होते हैं ॥ 1 ॥ याद तेरी जो न आए तो मैं रो पड़ता हूँ याँ , सब जहाँ ख़ुश बेवफ़ाओं को...Read more