ग़ज़ल : 233 – कुछ टेढ़े , कुछ कुबड़े

पहले ही बौने थे कुछ ; कुछ टेढ़े , कुछ कुबड़े ॥ औंधे मुँह गिरकर हो बैठे लूले औ’ लँगड़े ॥ प्यार था उनसे हमें बेइंतहा सचमुच , बेसबब करते रहे उनसे मगर झगड़े ॥ फूलों पे गिरकर भी कोई...Read more