पहले ही बौने थे कुछ ; कुछ टेढ़े , कुछ कुबड़े ॥

औंधे मुँह गिरकर हो बैठे लूले औ’ लँगड़े ॥

प्यार था उनसे हमें बेइंतहा सचमुच ,

बेसबब करते रहे उनसे मगर झगड़े ॥

फूलों पे गिरकर भी कोई कट सका हम भी ,

आरियों , तलवारों पे गिरकर हुए टुकड़े ॥

नाव ने हमको डुबोने में कसर कब की ,

हम किनारे आए तिनका दाँत से पकड़े ॥

हम थे भूखे हमने पहले रोटियाँ चाहीं ,

बाक़ी नंगे चिल्ला-चिल्ला मर गए कपड़े ॥

हम भी बुनना सीख लेते जाल भी लेकिन ,

क्या करें हम आदमी थे ; थे नहीं मकड़े ॥

चढ़ गया हम पर मुलम्मा इक टिकाऊ सा ,

ज़िंदगी से इस क़दर हम हैं गए रगड़े ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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