*मुक्त-मुक्तक : 873 – कच्ची मिट्टी

गलता बारिश में कच्ची मिट्टी वाला ढेला हूँ ॥ नेस्तोनाबूद शह्र हूँ मैं उजड़ा मेला हूँ ॥ देख आँखों से अपनी आके मेरी हालत को , तेरे जाने के बाद किस क़दर अकेला हूँ ? -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

खुल के अफ़वाहों का बाज़ार गर्म करता है

खुल के अफ़वाहों का बाज़ार गर्म करता है ॥ सच के कहने को तू सौ बार शर्म करता है !! जब तू बाशिंदा है घनघोर बियाबानों का ॥ क्यों तू मालिक है शहर में कई मकानों का ? तुझसे सीखे कोई...Read more

ग़ज़ल : 238 – द्रोपदी न समझो ॥

बारिश में बहते नालों ख़ुद को नदी न समझो ।। लम्हा तलक नहीं तुम ख़ुद को सदी न समझो ।।1।। अच्छे के वास्ते गर हो जाए कुछ बुरा भी , बेहतर है उस ख़राबी को फिर बदी न समझो ।।2।।...Read more

ग़ज़ल : 237 – दोपहर में रात

एक घटिया टाट से उम्दा वो मलमल हो गए ।। हंस से हम हादसों में पड़के गलगल हो गए ।।1।। हो गए शीतल सरोवर बूँद से वो और हम , रिसते – रिसते टप – टपकते तप्त मरुथल हो गए...Read more

ग़ज़ल : 236 – हिरनी जैसी आँखें

एक नहीं , दो भी छोड़ो झुण्डों के झुण्डों की ।। मेरे चूहे निगरानी करते हैं शेरों की ।।1।। जिनको आँखें रखकर भी कुछ सूझ नहीं पड़ता , मैं उनसे ज़्यादा इज़्ज़त करता हूँ अंधों की ।।2।। तुम उनको बातों...Read more

*मुक्त-मुक्तक : 872 – इक भूल………

उनकी सब हरकतें यों थीं बेजा मगर , हम उन्हे हँस के माक़ूल कहते रहे ॥ बंद कर आँखें उनके गुनाहों को भी , छोटे बच्चों सी इक भूल कहते रहे ॥ उनके कंकड़ को नग ; मक्खी मच्छर को...Read more