एक नहीं , दो भी छोड़ो झुण्डों के झुण्डों की ।।

मेरे चूहे निगरानी करते हैं शेरों की ।।1।।

जिनको आँखें रखकर भी कुछ सूझ नहीं पड़ता ,

मैं उनसे ज़्यादा इज़्ज़त करता हूँ अंधों की ।।2।।

तुम उनको बातों से अब समझाना बंद करो ,

सख़्त ज़रूरत है उनको घूँसों की लातों की ।।3।।

मुफ़्लिस का दीनो-ईमान न कुछ क़ीमत रखता ,

इस दुनिया में बात है तो बस दौलत वालों की 4।।

सब पाकर भी रहती अंधों बहरों की ख़्वाहिश ,

हिरनी जैसी आँखें , हाथी जैसे कानों की ।।5।।

ऊँची-ऊँची डिग्री रखती हैं जो साथ अपने ,

अक़्सर कम सुनतीं वो बहुएँ अनपढ़ सासों की ।।6।।

लाख तिजोरी ख़ाली हो पर फिर भी होती है ,

उसको सख़्त ज़रूरत मोटे पक्के तालों की ।।7।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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