एक घटिया टाट से उम्दा वो मलमल हो गए ।।

हंस से हम हादसों में पड़के गलगल हो गए ।।1।।

हो गए शीतल सरोवर बूँद से वो और हम ,

रिसते – रिसते टप – टपकते तप्त मरुथल हो गए ।।2।।

शेर की थे गर्जना , सागर की हम हुंकार थे ,

आजकल कोयल कुहुक , नदिया की कलकल हो गए ।।3।।

पार लोगों को लगाने कल तलक बहते थे जो ,

अब धँसाकर मारने वाला वो दलदल हो गए ।।4।।

सच ; जो दिल की खलबली का अम्न थे , आराम थे ,

धीरे – धीरे अब वही कोहराम हलचल हो गए ।।5।।

इक ज़रा सी भूल से हम उनके दिल से हाय रे ,

दोपहर में रात के तारों से ओझल हो गए ।।6।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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