ग़ज़ल : 241 – मैं हूँ लोहे का चना

राख़ को आग बनाने की न कर कोशिश तू ॥ मर चुका हूँ मैं जगाने की न कर कोशिश तू ॥ 1 ॥ मुझको मालूम है कितना तू भरा है ग़म से , दर्द हँस – हँस के छिपाने की...Read more

ग़ज़ल : 240 – आग से ठंडी

हँसना मत , हैराँ न होना देखकर मेरा जतन ।। कर रहा हूँ आग से ठंडी जो मैं अपनी जलन ।।1।। कैसे कर जाते हैं लोग इसकी बुराई या ख़ुदा , मुझको तो जैसा भी है लगता है जन्नत सा...Read more

ग़ज़ल : 239 – मैं कभी सावन कभी फागुन रहा हूँ

मग़्ज़ की कब सिर्फ़ दिल की सुन रहा हूँ ।। अनगिनत ख़्वाब उनको लेकर बुन रहा हूँ ।।1।। हो गया हूँ आज मीठा पान उनका , जिनको कल तक प्याज औ’ लहसुन रहा हूँ ।।2।। पूस का जाड़ा कभी तो...Read more