ग़ज़ल : 243 – राख़ हो जाता है सब कुछ

नज़र से गिरके उठने का किसी का वाक़िआ बतला ।। गड़े मुर्दे के चलने का किसी का वाक़िआ बतला ।।1।। ज़ुबाँ रखकर भी चुप रहते हैं कितने ही ज़माने में , मुझे गूँगे के कहने का किसी का वाक़िआ बतला...Read more

ग़ज़ल : 242 – महुए की कच्ची सुरा हूँ ॥

गड़ता कम भुँकता बुरा हूँ ।। पिन नहीं पैना छुरा हूँ ।।1।। एक सिर से पाँव दो तक , कोयले ही से पुरा हूँ ।।2।। हड्डियों सा हूँ कभी , मैं बिस्कुटों सा कुरकुरा हूँ ।।3।। काठ का पहिया हो...Read more