गड़ता कम भुँकता बुरा हूँ ।।

पिन नहीं पैना छुरा हूँ ।।1।।

एक सिर से पाँव दो तक ,

कोयले ही से पुरा हूँ ।।2।।

हड्डियों सा हूँ कभी , मैं

बिस्कुटों सा कुरकुरा हूँ ।।3।।

काठ का पहिया हो यदि तुम ,

मैं भी लोहे का धुरा हूँ ।।4।।

सबके दाँतों को हूँ कंकड़ ,

तुम्हें , चबाने मुरमुरा हूँ ।।5।।

सबको गंगा-जल उन्हेंं ही ,

महुए की कच्ची सुरा हूँ ।।6।।

अपनी मर्ज़ी से लुटा , कब

मैं चुराने से चुरा हूँ ।।7।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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