ग़ज़ल : 246 – क़ब्र खोदने को ……

हैराँ हूँ ; लँगड़े , चीतों सी तेज़ चाल लेकर ।। चलते हैं रोशनी में अंधे मशाल लेकर ।।1।। हुशयारों से न जाने करते हैं कैसे अहमक़ , आज़ादियों के चर्चे हाथों में जाल लेकर ।।2।। चलते नहीं उधर से...Read more

ग़ज़ल : 245 – धूप क्या होती है

एक पतला जानकर पापड़ तला वो ।। बिन हथौड़ा तोड़ने मुझको चला वो ।।1।। धूप क्या होती है दुख की , क्यों वो जाने ? सुख के साये में हमेशा ही पला वो ।।2।। फूँककर पीता है गर जो छाछ...Read more

ग़ज़ल : 244 – मामूली मकान

कल वो दिखती थी तुलसी आज पान लगती है ।। सच में गीता तो वो कभी क़ुरान लगती है ।।1।। उसकी आवाज़ की न पूछ क्या है लज़्ज़त सच , उसके मुँह से तो गाली भी अजान लगती है ।।2।।...Read more