कल वो दिखती थी तुलसी आज पान लगती है ।।

सच में गीता तो वो कभी क़ुरान लगती है ।।1।।

उसकी आवाज़ की न पूछ क्या है लज़्ज़त सच ,

उसके मुँह से तो गाली भी अजान लगती है ।।2।।

एक हम हैं कि बचपने में भी लगें बूढ़े ,

भर बुढ़ापे में भी वो नौजवान लगती है ।।3।।

करती सबका है क़त्ल वो निगाहों से अपनी ,

सख़्त हैराँ हूँ सबको अपनी जान लगती है ।।4।।

है वो बेमिस्ल , लाजवाब , है जुदा सबसे ,

वो न इस जैसी , वो न उस समान लगती है ।।5।।

वो क़िला है , वो शानदार इक महल अंदर ,

सिर्फ़ बाहर से मामुली मकान लगती है ।।6।।

जिसको देखो उसे ही चुप कराता फिरता है ,

मुझको वो बोलती भी बेज़ुबान लगती है ।।7।।

( बेमिस्ल = बेमिसाल , अद्वितीय / मामुली = मा ‘मूली , साधारण )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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