एक पतला जानकर पापड़ तला वो ।।

बिन हथौड़ा तोड़ने मुझको चला वो ।।1।।

धूप क्या होती है दुख की , क्यों वो जाने ?

सुख के साये में हमेशा ही पला वो ।।2।।

फूँककर पीता है गर जो छाछ को भी ,

दूध का होगा यक़ीनन इक जला वो ।।3।।

है नहीं मँगता मगर जब जब भी आया ,

दर से मेरे कुछ लिये बिन कब टला वो ।।4।।

जो मुकर जाता है अपनी बात से फिर ,

आदमी तो है मगर इक दोग़ला वो ।।5।।

आज के हालात ने ही उसको बदला ,

कल तलक इंसान था सच , इक भला वो ।।6।।

राधिका उसको मिली कैसे हूँ हैराँ ?

जबकि रत्ती भर नहीं है साँवला वो ।।7।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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