हैराँ हूँ ; लँगड़े , चीतों सी तेज़ चाल लेकर ।।

चलते हैं रोशनी में अंधे मशाल लेकर ।।1।।

हुशयारों से न जाने करते हैं कैसे अहमक़ ,

आज़ादियों के चर्चे हाथों में जाल लेकर ।।2।।

चलते नहीं उधर से तलवार , तीर कुछ भी ,

जाते हैं फिर भी वाँ सब हैराँ हूँ ढाल लेकर ।।3।।

हरगिज़ कुआँ न खोदें प्यासों के वास्ते वो ,

बस क़ब्र खोदने को चलते कुदाल लेकर ।।4।।

माथे नहीं हैं जिनके उनके लिए तिलक को ,

कुछ लोग थालियों में घूमें गुलाल लेकर ।।5।।

कुछ माँगने चला हूँ तो ये मुफ़ीद होगा ,

जाऊँ मैं उनके आगे मँगतों सा हाल लेकर ।।6।।

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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