नववर्ष

मरने पे या किसी के जन्मने पे नचेंगे ।। जानूँ न क्यों वलेक लोग बाग जगेंगे ।। तुम भी तमाशा देखने को रात न सोना ।। मरने पे मेरे थोड़ा भी मायूस न होना ।। 31 दिसंबर मैं चीख़ दे...Read more

मुक्त मुक्तक : 891 – दुशाला

चहुँदिस स्वयं को मैंने जिससे लपेट डाला ।। ऊनी नहीं न है वो मृत वन्य मृग की छाला ।। चलते हैं शीत लहरों के तीर जब बदन पे , बन ढाल प्राण रक्षा करता यही दुशाला ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

ग़ज़ल : 270 – फ़ित्रत

हमने अजीब ही कुछ फ़ित्रत है पायी यारों ।। हर बात धीरे-धीरे-धीरे ही भायी यारों ।। उस तक पलक झपकते हम मीलों दूर पहुँचे , वह दो क़दम भी हम तक बरसों न आयी यारों ।। उसको तो मौत ने...Read more

मुक्त मुक्तक : 890 – तस्वीर

फूलों सी खिलखिलाती , तारों सी झिलमिलाती ।। आँखों को हर किसी की बेसाख़्ता लुभाती ।। वो जिनकी ज़िंदगी को ग़म ने जकड़ रखा है , तस्वीर उनकी अक्सर होती है मुस्कुराती ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्त मुक्तक : 889 – आश्रित

पेट जो परिवार का ही पालने में मर गया ।। शुष्क आँखों के मरुस्थल आँसुओं से भर गया ।। अपने पालक का मरण यूँ देख उसका आश्रित आह , लोग डरते मृत्यु से वह ज़िंदगी से डर गया ।। -डॉ....Read more

कविता : नास्तिकता क्यों ?

धर्मभीरु भर घृणा से करते हैं आपस में बत । धर्म से च्युत ईश्वर से सर्वथा हूँँ मैं विरत ।। पूछते रहते हैं मैं क्यों नास्तिक हूँँ तो सुनो । पूर्णत: ध्यानस्थ होकर तथ्यत: सर्वस गुनो ।। किंतु यह भी...Read more