जूता – चित्र काव्य : 2

बर्फ़ की तह पर हिरन सा दौड़कर भी कब गला ? धूप में अंगार सी कब रेत पर मैं थम जला ? मेरी मंज़िल के तो सब ही रास्ते पुरख़ार थे , उनपे हँसते -हँसते मैं जूतों के ही दम पर चला !...Read more

मुक्त मुक्तक : 875 – लुकता

   मत ज़रा भी सोचना आख़िर गया हूँ मैं किधर ? ढूँढना भी मत कहीं जा कर उधर या आ इधर । गिरके तेरी नज़रों से तुझसे ही तो बचने को मैं , उस जगह जा छिप गया कोई नहीं...Read more

मुक्तक : 874 – औरों को गिराने गड्ढे में………

औरों को गिराने गड्ढे में ख़ुद डूब कुएँ में बैठे हैं ।। ग़ैरों को हराने में अपना सब हार जुएँ में बैठे हैं ।। उनको ना नजर आ जाएँ बस ये सोचकर उनके ही आगे , कुछ दूर किसी गीली...Read more

शुभकामना नववर्ष की………

बादलों से गिर धरा पर कड़कड़ाती बिजलियों को ।। जल से बाहर तड़फड़ाती फड़फड़ाती मछलियों को ।। फूल पर मंडराते भँवरों स्वस्थ-सुंदर तितलियों को ।। यदि करें स्वीकार तो शुभकामना नव वर्ष की ।। तंग गलियां सूनी सड़कों घर-मकानों के...Read more