बर्फ़ की तह पर हिरन सा दौड़कर भी कब गला ?

धूप में अंगार सी कब रेत पर मैं थम जला ?

मेरी मंज़िल के तो सब ही रास्ते पुरख़ार थे ,

उनपे हँसते -हँसते मैं जूतों के ही दम पर चला !

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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