मुक्त मुक्तक : 879 – अच्छी नहीं ज़रा भी…..

अच्छी नहीं ज़रा भी , है इस क़दर ख़राब !! कहते हैं लोग मेरी है ज़िंदगी अज़ाब !! दिन-रात इतनी मैंने पी है कि अब तो आह ! मेरी रगों में बहती ख़ूँ की जगह शराब !! -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्त मुक्तक : 877 – गूँगी तनहाई…….

गूँगी तनहाई में चुपचाप जब मैं रहता हूँ !! रौ में जज़्बातों की तिनके से तेज़ बहता हूँ !! लिखने लगता हूँ मैं तब शोक-गीत रोते हुए , या कोई शोख़ ग़ज़ल गुनगुना के कहता हूँ !! -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्त मुक्तक : 878 – यह को वह …….

तजकर कभी , कभी सब कुछ गह लिखा गया !! पीकर कभी , कभी प्यासा रह लिखा गया !! लिखने का जादू सर चढ़ बोला तो बोले सब , ये क्या कि मुझसे ‘ यह ‘ को भी ‘ वह...Read more

चित्र काव्य : वो

बहुत ही ख़ास बहुत ही अज़ीज़ था मेरा , वो उस जगह पे कहीं हाय खो गया इक दिन ॥ चुरा के मुझ से मेरा दिल क़रार की नींदें , बग़ैर मुझ को बताये ही सो गया इक दिन ॥...Read more

चित्र काव्य – खम्भा

यों ही कमर पे हाथ न रखकर खड़ा हूँ मैं !! खंभे सा उसके इंतज़ार में गड़ा हूँ मैं !! बैठे हैं वो न आने की क़सम वहाँ पे खा , उनको यहाँ बुलाने की ज़िद पर अड़ा हूँ मैं...Read more

मुक्त मुक्तक : 876 – रक्तरंजित

मैंने पाया है क्या और किससे हूँ वंचित ? पूर्ण कितना हूँ मैं और कितना हूँ खंडित ?  भेद पूछो जो क्या है मेरी लालिमा का ,  जान जाओगे मैं कितना हूँ रक्तरंजित ?    -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more