आँखों को आज उससे चुराना पड़ा मुझे !!

 कुछ कर दिया कि सिर को झुकाना पड़ा मुझे !!

जिसको मैं सोचता था ज़मीं में ही गाड़ दूँ ,

उसको फ़लक से ऊँचा उठाना पड़ा मुझे !!

उसको हमेशा खुलके हँसाने के वास्ते ,

कितना अजीब है कि रुलाना पड़ा मुझे !!

उसकी ही बात उससे किसी बात के लिए ,

कहने के बदले उल्टा छुपाना पड़ा मुझे !!

नौबत कुछ ऐसी आयी कि दिन-रात हर घड़ी ,

रटता था जिसको उसको भुलाना पड़ा मुझे !!

दुश्मन ज़रूर था वो मगर इतना था हसीं ,

उसको जो जलते देखा बुझाना पड़ा मुझे !!

सचमुच बस एक बार बुलंदी को चूमने ,

ख़ुद को हज़ार बार गिराना पड़ा मुझे !!

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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