बहुत ही ख़ास बहुत ही अज़ीज़ था मेरा ,
वो आस्माॅं में कहीं हाय खो गया इक दिन ।।
चुरा के मुझसे मेरा दिल क़रार की नींदें ,
बग़ैर मुझको बताए ही सो गया इक दिन ।।
न जाने क्यों वो यकायक गया सिमट मुझसे ?
जो आठों याम रहा करता था लिपट मुझसे ;
कहा न मैंने कभी उससे दूर जाने को ,
मगर न आया वो फिर लौट जो गया इक दिन ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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