मुक्त मुक्तक : 884 – प्रेम

पूर्णतः करते स्वयं को जब समर्पित !! प्रेम तब बैरी से कर पाते हैं अर्जित !! जान लोगे यदि गुलाबों से मिलोगे , पुष्प कुछ काँटों में क्यों रहते सुरक्षित ? -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

ग़ज़ल : 252 – वो नहीं होगा मेरा

वो नहीं होगा मेरा ये जानता हूँ मैं !! फिर भी उसको अपनी मंज़िल मानता हूँ मैं !! दोस्त अब हरगिज़ नहीं वह रह गया मेरा , फिर भी उस से दुश्मनी कब ठानता हूँ मैं !! पीठ में मेरी...Read more

मुक्त मुक्तक : 882 – कुत्ता

गर्दिश तक में कुत्ता भी आराम से सोता है !! मीठे ख़्वाबों के दरिया में लेता गोता है !! अहमक़ इंसाँ ख़ुशियों में भी करवट ले-लेकर , बिस्तर पर सब रात ही बैठ-उठ रोता-धोता है !! -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

मुक्त मुक्तक : 881 – बाँग

बाँग मुर्गे सी लगाओ जो जगाना हो तो !! गाओ बुलबुल सा किसी को जो सुनाना हो तो !! फाड़ चिल्लाओ गला चुप न रहो तुमको उसे , जो न आता हो अगर पास बुलाना हो तो !! -डॉ. हीरालाल...Read more

मुक्त मुक्तक : 880 – एक कोंपल……..

एक कोंपल था पका पत्ता न था , शाख से अपनी वो फिर क्यों झर गया ? हमने माना सबकी एक दिन मृत्यु हो , किंतु क्यों वह शीघ्र इतने मर गया ? लोग बतलाते हैं था वह अति भला...Read more