आपस में बेमक़सद लड़ते मरते देखा है !!

इंसाँ को कुत्ते सी हरक़त करते देखा है !!

गिरगिट से भी ज्यादा रंग बदलने वाले को ,

मैंने होली में रंगों से डरते देखा है !!

गर तुमने देखी है चूहे से डरती बिल्ली ,

मैंने भी बिल्ली से कुत्ता डरते देखा है !!

प्यार में अंधे कितने ही फूलों को हँस-हँसकर ,

नोक पे काँटों की होठों को धरते देखा है !!

हैराँ हूँ कल मैंने इक ज्वालामुखी के मुँह से ,

लावे की जा ठण्डा झरना झरते देखा है !!

कैसा दौर है कल इक भूखे शेर को जंगल में ,

गोश्त न मिलने पर सच घास को चरते देखा है !!

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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