क्या शह्र फ़क़त , क़स्बा ही न बस ,

इक गाँव से भी चल सकते हैं !!

कोटर , बिल , माँद , दरार , क़फ़स से

ठाँव से भी चल सकते हैं !!

होते हैं दो पंख भी बेमानी

उड़ने का इरादा हो न अगर ,

मंज़िल की मगर धुन हो तो कटे

इक पाँव से भी चल सकते हैं !!

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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