मुक्त मुक्तक : 885 – सूखा तालाब

कैसा ये अजीबोग़रीब मेरा जहाँ है ? बरसात के मौसम में भी तो सूखा यहाँ है !! सोना न , न चाँदी , न हीरे-मोती समझना तालाब में ढूँढूँ मैं अपने पानी कहाँ है ? -डॉ. हीरालाल प्रजापतिRead more

ग़ज़ल : 253 – दामाद

ग़मज़दा लोगों को क्यों मैं याद रहता हूँ ? दर्द में भी जो मज़ा सा शाद रहता हूँ !! अपने सीने में जकड़ लो बाँध लो कसके , ऐसी ही क़ैदों में मैं आज़ाद रहता हूँ !! उसके क़ब्ज़े में...Read more