ग़ज़ल : 261 – ग़ज़लें

नंगे पांँवों जब काँटों पर चलना आता था ।। तब मुझ को तक़्लीफ़ में भी बस हंँसना आता था ।। उसके ग़म में सच कहता हूंँ हो जाता पागल , मेरी क़िस्मत मुझको ग़ज़लें कहना आता था ।। उसने मुंँह से...Read more

ग़ज़ल : 260 – कैसे-कैसे लोग

   कैसे-कैसे लोग दुनिया में पड़े हैं ।। सोचते पाँवों से सिर के बल खड़े हैं ।। आइनों के वास्ते अंधे यहाँँ , वाँ गंजे कंघों की खरीदी को अड़े हैं ।। जिस्म पर खूब इत्र मलकर चलने वाले ,...Read more

ग़ज़ल : 259 – पापड़

   जिस्म धन-दौलत सा जोड़ा जा रहा है ।। और दिल पापड़ सा तोड़ा जा रहा है ।। दौड़ता है पीछे-पीछे मेरा कछुआ , आगे-आगे उनका घोड़ा जा रहा है ।। पहले ख़ुद डाला गया उस रास्ते पर , अब...Read more

ग़ज़ल : 258 – फूल…..

देते हैं ज़ख़्म पत्थर को भी यहाँँ के फूल ।। देती पहाड़ को भी टक्कर इधर की धूल ।।1।। हेठी क्या इसमें ख़ुद बढ़ हाथी जो करले सुल्ह , चींटी से दुश्मनी को देना न ठीक तूल ।।2।। सर ,...Read more

ग़ज़ल : 256 – मंज़िल

सच दोस्ती न रिश्तेदारी न प्यार है ।। दुनिया में सबसे बढ़कर बस रोज़गार है ।।1।। मंज़िल पे हमसे पहले पहुंँचे न क्यों वो फिर , हम पे न साइकिल भी उसपे जो कार है ।।2।। सामाँँ है जिसपे ऐशो-आराम...Read more

ग़ज़ल : 255 – वो मेरा है…….

बड़ी जिद्दोजहद से , कशमकश से , सख्त़ मेहनत से ।। मोहब्बत मैंने की दुश्मन से अपने घोर नफ़रत से ।।1।। न भूले भी पड़ा क्यों इश्क़ के पचड़ों – झमेलों में ? बचाए ख़ुद को रखने ही ज़माने भर...Read more